बुधवार, 1 मई 2013

नेता जो ढूँढन मै चली ............



आजकल कोई भी समाचारपत्र पढ़ने का प्रयास करें अथवा किसी खबरी चैनल देखें ,हर जगह सम्भावित चुनाव और उसके सम्भावित प्रत्याशियों पर ही अटकलें लगाईं जा रही हैं । अब इस चुनावी मौसम की बहती गंगा में अपना भी दायित्वबोध जाग्रत हो गया ,क्या करें मजबूरी जो थी कितना सोया जाए ! 

हमने सोचा हर बार आरोपों की ढेरी नेताओं ,यहाँ मेरी तात्पर्य राजनेताओं से है कृपया किसी भी प्रकार की गलतफ़हमी को बढ़ावा न दिया जाए ,की तरफ बड़ी इज्जत के साथ सरका देते थे ,परन्तु इस बार बस स्वाद बदलने के लिए थोड़े से ज़िम्मेदार बनने का प्रयास कर लिया जाए ! चलिए इस पूरे रहस्य पर से पर्दा हटा देते हैं :) 

हमने सोचा एक चुनावी दल हम भी बना लें जिसमें पढ़े - लिखे आम जन ही सम्मिलित हों ! बेशक बाद में वो आमजन भी ख़ास बन जायेंगे ! 

कोई भी नया और अच्छा काम करना हो तो निगाहें सबसे पहले युवा सोच को ढूँढती हैं ,तो हमने भी सोचा अब आजकल तो बच्चों की लगभग सभी परीक्षाएं समाप्त हो गईं हैं और वो भी अपेक्षाकृत सुकून भरे हुए कुछ नया करने की सोच रहे होंगे । बस इसी ख्याल की उम्मीद से भरपूर युवाओं को तलाशने लगी और "जिन खोजा तिन पाइयां"की तर्ज़ पर जोश से भरे हुए एक समूह पर अपनी खोजी दृष्टि अटक गयी । बड़ी उम्मीदों से भर उनको समझाने का प्रयास शुरू किया ही था कि उन्होंने समझदारी और त्वरित - बुद्धि का परिचय देते हुए पतली गली से खिसकने का प्रयास शुरू किया । पर आज तो हम पर भी राष्ट्र के प्रति प्रेम कुछ ज्यादा ही जोर मार रहा था । हमने उनको पहले तो बहलाने का प्रयास किया पर जब बात नहीं बनी ,तो हमने सोचा कि सीधा रास्ता अपनाते हुए दो टूक पूछ ही लिया जाए । पर वाकई आज के युवा कितना लिहाज करते हैं और सुसंकृत हैं पता चल गया । मेरे हर तरह के सीधे - टेढ़े सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि उन्होंने तो पढाई की है तो उनको कोई काम मिल ही जाएगा और वो उस काम को पूरी ईमानदारी से करते हुए भी राष्ट्र सेवा कर लेंगे पर  अगर इस काम को एक दूसरे नजरिये से किया जाए तो बेरोजगारी की समस्या का भी समाधान हो जाएगा ।   हमारी जिज्ञासा के समाधान में उन्होंने कहा कि नेतागिरी के लिए किसी प्रकार की शैक्षिक योग्यता की जरूरत ही नहीं है ( 


अब सारी आशाओं का केंद्र बना सामने से अपनी ही मस्ती में झूम कर आता हुआ एक मलंग ! बचे हुए मक्खन के साथ हम एकदम वायुवेग से उसकी तरफ लपके कि  कोई और न उसको लपक ले । अब इस बाहुबली को हमने समझाना शुरू किया । तमाम पैंतरे अपनाते हुए नेता बनने के तमाम फायदे बतलाये । पर ये तो कुछ ज्यादा ही समझदार निकला ,बिना एक पल भी गँवाए उसने मेरे प्रस्ताव को ध्वनिमत ,अरे नहीं गुर्राहट से ठुकरा दिया कि जब बिना मेहनत किये ही उसको चुनाव के समय में तमाम सुविधाएं मिल जाती हैं तो वो काहे को खद्दर पहन कर नेतागिरी चमकाये !


अपनी युवा - शक्ति और मलंग से निराश हो कर एक आम से दिखते हुए मानवतन धारी से अनुरोध किया ( अब क्या करते इस महँगाई के दौर में मक्खन खत्म हो गया था न )और यथासंभव उसको पुदीने की झाड़ पर चढ़ाने का प्रयास किया । ये आम इंसान भी बड़ा समझदार निकला ,उसने तो तुरंत ही हाथ जोड़ दिए , "भइये ये नेतागिरी तो किसी ऐसे ही व्यक्ति को सजती है जिसके पास धन बल ,बाहु बल और जिसमें अपनी बातों को समयानुसार बदलने की सामर्थ्य हो । अब एक आम इंसान तो बातों पर ही मरता रहता है , कभी अपनी तो कभी दूसरों की बातें ।"

अब कोई और शख्स तो मुझे समझ में नहीं आ रहा जिसके कंधों का सहारा लेकर अपने चुनावी दल का श्रीगणेश  करूँ ,तो सोचती हूँ अपना पुराना काम ही करती रहूँ ,वही खुद कुछ न कर के भ्रष्टों के हाथों में सत्ता और शक्ति सौंप कर उनमें कमियाँ निकालती रहूँ और अपनी और उनकी गलतियों का खामियाज़ा भरती रहूँ (



            " नेता जो ढूँढन मै चली ,हाय नेता न मिलया कोय 
                       चरित्र बखान जो किया ,हाथ जोड़ भागे सब कोय "
                                                                                   -निवेदिता 





18 टिप्‍पणियां:

  1. इन नेता में कोई नेता मिला क्या ?

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  2. :):) नेता आज का पढ़ा लिखा कोई युवक नहीं बनना चाहता । इसी लिए तो देश का यह हाल है ।

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    1. अरे वाह ! आप तो एकदम हमारे मन तक पहुँच गयी :)

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (02-05-2013) दो मई की दिलबाग विर्क की चर्चा - 1232 में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बढ़िया विचार है , हम आपको ही नोमिनेट ना कर दे हमारे नेता के रूप में :)

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    1. क्या वाणी जी ,हम आपको इतने ईमानदार लगते हैं क्या :)

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  5. बहुत अधिक अपेक्षायें रखेंगी तो दुखी हो जायेंगी, उपेक्षा कर दीजिये, जीवन तब भी चलता रहेगा।

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    1. ये उपेक्षा करना ही तो इस देश का दुर्भाग्य है (

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  6. राजनीति से सभी भागना चाहते हैं क्योंकि फिलहाल यह काम ईमानदार लोगों का है नहीं। बेईमानी का काम कोई सामान्य आदमी तो करेगा नहीं। आपकी काल्पनिक मुलाकात किसी लुच्चे-लफंगे से होती तो वह जरूर नेतागिरी करने के लिए हां भरता। साधारण-सामान्य-ईमानदार लोग अपने काम से काम रखते हैं।

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    1. दिक्कत यही है कि कोई ईमानदार आ कर इन को आइना नहीं दिखाता .....

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  7. बहुत खूब योजना आपकी | उम्मीद है यह ख्याल सच हो जाये |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  8. नेतागीरी के लिए बड़े गुर सीखने होते हैं और फिर जिन्हें बिना मेहनत सब कुछ मिल जाए तो क्यों नेता कहलायें . कल को किसी लफड़े में फँस गए तो अन्दर भी जाना होगा . इसलिए चुपचाप पीछे से मलाई खाए रहो और रहो.

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  9. शानदार पोस्ट आखिरी दोहा तो कमाल का है बिलकुल कबीर की शैली में |

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