शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

विदुर

       
        शांतनु के सत्यवती से विवाह के बाद हस्तिनापुर के इतहास में क्रमिक पतन होने लगा था । तथाकथित युगपुरुष "भीष्म" ने प्रतिज्ञाबद्ध हो आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन किया । शांतनु-सत्यवती के दो पुत्र हुए -चित्रांगद और विचित्रवीर्य । चित्रांगद का देहांत अल्पायु में ही हो गया था । विचित्रवीर्य का विवाह काशीनरेश की दो पुत्रियों - अम्बिका और अम्बालिका - से हुआ । एक युद्ध में विचित्रवीर्य की जब मृत्यु हुई वह नि:सन्तान था । सत्यवती ने भीष्म से अम्बा और अम्बालिका से नियोग के लिए कहा ,परन्तु भीष्म ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया । तब सत्यवती ने अपने और ऋषि पराशर के पुत्र व्यास को इस कार्य के लिए चुना ।अम्बिका और अम्बालिका की खामोश असहमति और अरुचि के फलस्वरूप दृष्टिहीन धृतराष्ट्र और रोगग्रसित पाण्डु का जन्म हुआ । दुविधाग्रस्त होने पर रानियों ने अपनी दासी "विनता" को व्यास के पास भेजा । विनता के संतुलित मन:स्थिति के फलस्वरूप संतुलितामना विदुर का जन्म हुआ ।
         विदुर ने राजपुत्र न होते हुए भी राजकुल की गरिमा का पालन ताउम्र किया । अपने सात्विक आचरण का परिचय देते हुए राजमहल की सुख-सुविधाओं का दासत्व स्वीकार नहीं किया । ऋषि-मुनि जिस तपश्चर्या के लिए वन अथवा पर्वत की कन्दराओं में जाते थे ,उसको विदुर ने राजसी वैभव से अविचलित रहते हुए महल में ही किया । विदुर का विवाह राजा देवक की दासीपुत्री "सुलभा" से हुआ । देवक कृष्ण के नाना थे ,इस सम्बन्ध से विदुर कृष्ण के मौसा थे । सुलभा भी विदुर के समान ही संतुलित और सात्विक विचारों वाली थी । 
        विदुर हस्तिनापुर की राज्यसभा में विशिष्ट महत्व रखते थे । धृतराष्ट्र विदुर के विचारों के बहुत मान देते थे । सम्भवत: इसीलिये दर्योधन के पीड़ा देते आचरण को विदुर ने सहा और हस्तिनापुर के प्रति अपनी निष्ठा को  बनाये रखा । एक बार दुर्योधन से विवाद बढ़ जाने पर ,धृतराष्ट्र ने विदुर को हस्तिनापुर से निष्कासित कर दिया था परन्तु ये आभास पाते ही कि विदुर के मिल जाने से पाण्डवों की शक्ति और भी संतुलित और समृद्ध हो जायेगी , विदुर को हस्तिनापुर वापस बुला लिया ।
       कौरवों की हठधर्मिता और अविवेकी आचरण को विदुर नापसंद करते थे और पाण्डवों के सदाचरण के प्रति अनुराग रखते थे । इस पसंद-नापसंद के दोराहे पर भी विदुर हस्तिनापुर के प्रति निष्ठावान बने रहे । दुर्योधन की कुटिलता से परिपूर्ण चालों से पाण्डवों को बचाने के लिये सतत प्रयासरत रहते हुए उसको सुधारना भी चाहा । इस प्रकार राज्य के प्रति अपनी निष्ठा और गलत का विरोध करने में संतुलन बनाये रखा ।      

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  2. महाभारत की कथा का हर पहलु रोचकता, ज्ञान और नीति से परिपूर्ण है।

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  3. दरबार के उपहास में केवल विदुर स्वर कुछ दृढ़ता लिये हुये था।

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    1. मात्र दरबार ही नहीं हर प्रसंग में सच कहने का साहस सिर्फ विदुर ही कर पाए ... आभार !

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  4. महाभारत के महत्‍वपूर्ण पात्र विदुर के परिचय के लिए आभार।
    सच कहूं तो महाभारत में कर्ण के बाद यही पात्र मुझे प्रिय है।

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    1. सच कहा आपने ,बाकी के हर चरित्र ने अपनी मजबूरियों का ही प्रदर्शन ही किया है | विदुर सबसे संतुलित और प्रभावशाली रूप में ही याद आते हैं !

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  5. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  6. नीति निर्देशक प्रसंग. सार्थक प्रस्तुति.

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  7. बहुत बेहतरीन....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  8. विदुरनीति मेरी पुस्तकों के संग्रह का आवश्यक अंग है। यद्यपि उन्हे और शल्य को पाण्डवों के फेसिलिटेटर के रूप में ज्यादा पाता हूं, बनिस्पत उनके नीति-दर्शन के।

    बढ़िया लिखती हैं आप। ब्लॉग का फॉण्ट साइज कुछ बड़ा होता तो ज्यादा जमता।

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  9. शायद यही विदुर नीति सिखाती है जीवन में संतुलन कैसे बनाया जाए ...
    बहुत कुछ है महाभारत में जो जिया जा सकता है ...

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  10. Vidur ke baare me sarsari jaankaari to thi hi, unke charitra ki visheshtaa sarva-vidit hai. Strong character, jaise Bhism Pitamah, Guru Dronachaarya, Karna aadi, kisi na kisi majboori, Raj dharm ya ehsaan se dabe hone ke karan hi Duryodhan ke saath rahe. Mujhe lekh achha laga.

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  11. विदुर का महाभारत में अहम् रोल था .. रोचक प्रस्तुति !

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  12. अच्छी पोस्ट! संतुलन बनाये रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है।

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