इस गुमसुम खामोशी में
ख्यालों की आंधियां लाते
अनसुलझे सवालों में
धूपिल छाँव तलाशते
कैसे हैं ये जज्बात !
कभी पानी सा सरल
कभी पानी सा कठोर,
धूमिल पगडंडी से
कभी जुगनू सी चमक
कभी बिजली की कडक,
कभी मील के पत्थर बन
राहें सरल कर जाती ,
कभी गहराइयों में ढकेलती
खाइयों में दफ़न कर जाती ,
ये कैसी आवाज़ है दम घोंटती
सुन कर भी अनसुनी ही करती .......
-निवेदिता

