गुरुवार, 31 मार्च 2011

गुमसुम खामोशी ........

इस गुमसुम खामोशी में 
ख्यालों की आंधियां लाते
अनसुलझे सवालों में 
धूपिल छाँव तलाशते
कैसे हैं ये जज्बात !
कभी पानी सा सरल 
कभी पानी सा कठोर,
धूमिल पगडंडी से 
धुंधलाते जाते रास्ते ,
कभी जुगनू सी चमक 
कभी बिजली की कडक,
कभी मील के पत्थर बन 
राहें सरल कर जाती ,
कभी गहराइयों में ढकेलती
खाइयों में दफ़न कर जाती ,
ये कैसी आवाज़ है दम घोंटती 
सुन कर भी अनसुनी ही करती .......
                        -निवेदिता