" पूर्ण विराम " ... ये ऐसा चिन्ह है जो वाक्य की पूर्णता को दर्शाता है । लगता है शायद उस स्थान पर आकर सब कुछ समाप्त हो गया है । यदयपि उन्ही बातों को शब्दों के मायाजाल से सजा कर कुछ अलग - अलग रूप देकर अपने कथ्य को थोड़ा विस्तार देने का प्रयास तब भी होता रहता है ।
एक सामान्य जीवन भी ऐसा ही होता है । जब हम छोटे होते हैं तब हमारे अभिभावक हमारी ऊँगली थाम कर हमको चलना सिखाते हैं - शिक्षा के द्वारा और अपने संस्कारों के भी द्वारा । अक्सर वो अपने अपूर्ण सपनों को हमारी पलकों में सजा हमारे जीवन का उद्देश्य बना देते हैं । हम भी सहज भाव से उनको अपना मान पूरे मनोबल से साकार करने में जुट जाते हैं । कभी अपने असफल रह जाने पर ,एक परंपरा की तरह ,उस सपने को अपनी संतति के पलकों तले रोप देते हैं ,और फिर जो हमने किया था वही हमारी अगली पीढ़ी करने लग जाती है । इस तरह से लगता है कि हम पूर्णविराम के बाद बारम्बार हम चेहरे बदल बदल कर भी वही कहते और करते रह जाते हैं .....
वैसे यहाँ तक भी पूर्णविराम के बाद भी जीवन जीवित लगता है । जब अभीष्ट मिल जाता है ,तब उस पल वाकई जीवन पूर्णविराम को प्रतिबिम्बित करता लगता है । जैसे लगता है कि अब करने को कुछ बचा ही नहीं । जैसे एक नशे की मनःस्थिति में जीवन बीतता गया कि अभी बच्चों को शिक्षित करना है ,अभी संस्कार देने हैं ,अभी समाज से उनका परिचय कराना है और सबसे बढ़कर उनकी पहचान को दृढ़ता देना है । सीधे शब्दों में कहूँ तो बस ये लगता है कि उनके हर कदम पर और जब भी वो पलट कर पीछे देखें तो उनको एक आश्वस्ति का बल देना है कि वो अकेले नहीं है अपितु दिखे या न दिखे हम हमेशा उनके साथ हैं ।
इतना सब होने के बाद का पल ,लगता है जीवन के वाक्य पर पूर्णविराम लग जाता है । एक विचित्र सी मन:स्थिति होती है जैसे सब कुछ रीत गया और गागर खाली हो गई है । अब करने को कुछ बचा ही नहीं और जीवन शून्य हो गया है ,अब तो इस पर भी पूर्णविराम लग ही जाना चाहिए ...... निवेदिता

