शब्द यूँ ही भटकते - अटकते रहे
कभी ख़्वाबों तो कभी ख़यालों में
इक नामालूम सी श्वांस सरीखी
मासूम सी पनाह की तलाश में
बेपनाह आवारगी का दामन थाम
अजीब सी चाहत पहचानी राह में
खामोशी से उभर अपना ख़्वाब बनी
मेरी चाहत के शब्दों को , काश
मिल जायें बस स्वर तुम्हारे ........
-- निवेदिता