डोली और अर्थी
एक सी होती हैं
दोनों को उठाने के लिए
कंधे चार ही चाहिए
दोनों पर खिलते फूलों की
अनवरत बरसात चाहिए
दोनों के पीछे चलती हैं
जानी अनजानी शक्लें ,
दोनों को ही भिगोती
कईयों की अश्रुधार है !
पर हाँ !
एक कदम चलते ही
अलग -अलग होती
दोनों की किस्मत है
डोली पर बरसे फूलों में
छिपी - छिपी सी दिखती
नवजीवन की आस है
डोली के आँसुओं में
फिर मिलने की आस है !
अर्थी पर बिछे फूल जतलाते
अर्थी पर बिछे फूल जतलाते
जीवन की क्षणभंगुरता
अनजाने अनिवार्य सफर की
यही तो अनचाही शुरुआत है !
दोनों को ही मंजिल
मिलनी है अनदेखी
एक में सृष्टि की आस है
दूजी हर तरफ से निराश है ........
-निवेदिता

