सोमवार, 4 जुलाई 2011

बोलो तो तुमको कैसे पुकारूँ ........

राधा ....राधिका ...........
या फिर कृष्ण प्रिया ...
बोलो तो तुमको कैसे पुकारूँ
ऐसा कौन सा संबोधन दूँ तुमको
जो तुमको मन भावे .....
ये क्या सवाल पूछती हो ....क्यों ...
अरे जो तुम्हे भावे ,वही तो मेरे 
श्याम साँवरे को रिझाये .....
अरिष्ट ग्राम की लाडली .....
गोकुल की मान .....
रायाण की सहधर्मिणी ......
मन मोहना की मन प्राण ......
तेरे तो नाम में ही कान्हा आ विराजे ...
'रा' ने दिया तुझे लाभ और 
सखी 'धा' में समाया मोक्ष.......
जिस राधा का अर्थ ही है ...'मोक्ष लाभ'..... 
बता तो कैसे न हो तेरे ह्रदय में 
कान्हा का निवास ............
बता और गोपियों को क्यों न मिला ,
ये छलिया ..... और सबने तो .....
उसे पाना चाहा ....पर तूने तो .....
कृष्णमय   होना चाहा ......
बता न बिना समर्पण के कहाँ मिले ....
आत्मा को प्राण .......
शरद पूर्णिमा की रात्रि सा निर्मल ,
सजता महारास औ खनकती झाँझर 
कान्हा की वंशी से बरसते राधिका के 
आत्मार्पित भाव ...... कभी झूले की 
ऊँची जाती पींगों सा झूमते ..........
चंद सवाल ........ ये मोरपंखी रंगों सा 
सजा-सँवरा सबको लागे कितना प्यारा ......  
                                                       -निवेदिता