झरोख़ा

"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।

सोमवार, 30 नवंबर 2020

लघुकथा : कन्यादान

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 लघुकथा : कन्यादान भाभी ! हम लोगों का समय ही ठीक था । छह - सात साल की होते ही लड़कियों की शादी कर दी जाती थी । बताओ इतनी बड़ी हो गयी ये इला .....
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निवेदिता श्रीवास्तव
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