झरोख़ा

"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।

सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

कहानी : मन्ज़िल

›
मन्ज़िल विभा जैसे ज़िंदगी की जद्दोजहद से उबर कर शांत हो चुकी थी । वैभव की तरफ देखते हुए उसने पूछा ,"ले आये न ... कोई दिक्कत तो नहीं हुई न...
2 टिप्‍पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
निवेदिता श्रीवास्तव
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.