झरोख़ा

"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

नमक जिंदगी का

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 कभी कभी  ये हँसी  उमगती है  किलकती है  बस एक  झीनी सी  ओट दे जाने को  और आँसुओं को  ख़ुशी के जतलाने को  और हाँ  ये आँसू भी तो  बेसबब नही  इन...
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निवेदिता श्रीवास्तव
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