झरोख़ा

"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।

शनिवार, 20 मई 2023

सुनो न ...

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जीवन हर पल बहता जाता  गुनता रहता खुद को  अलबेली नदी सरीखा पर सुनो न ... तटबंधों की पुकार भूल जाती हूँ! नदी सी बनती जा रही हूँ बाढ़ भी ले कर आ...
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निवेदिता श्रीवास्तव
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