झरोख़ा

"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।

सोमवार, 24 मई 2021

लघुकथा : कामवाला नाम

›
 बेबसी भटक रही थी और जीवन की लिप्सा उसकी आँखों में करवटें ले रही थी । अनजान हाथों ने उसकी भटकन को एक घर का आसरा दिया । पर ये क्या ... हर दिन...
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
निवेदिता श्रीवास्तव
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.