झरोख़ा

"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।

रविवार, 20 अगस्त 2017

खिड़कियाँ ......

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हाँ ! सच है ये खिड़कियाँ होती है नरम पुरवाई सी नाजुक बहुत कुछ देखती हैं और सुनती भी हैं  बेजुबान सी .... पर ये भी तो सच है खिड़किया...
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निवेदिता श्रीवास्तव
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