झरोख़ा

"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।

सोमवार, 21 मार्च 2016

21 मार्च 2016 .....

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कभी मना कर रूठ जाते है वो  कभी यूँ भी रुठ कर मनाते है जो हार जाये वो प्यार क्या  तकरार न हो  इजहार क्या  नजरों से  नजरें चुराते है वो...
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निवेदिता श्रीवास्तव
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